स्वीडिश लेखक बर्टिल लिंटनर ने अपनी किताब चाइनाज इंडिया वॉर में लिखा है, ”सोवियत संघ और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत 1950 के दशक में शुरू होती है. 1960 में रोमानिया की कम्युनिस्ट पार्टी की कांग्रेस में तत्कालीन सोवियत नेता निकिता ख़्रुश्चेव और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो मेंबर पेंग चेन के बीच बहस हुई थी.”
”ख़्रुश्चेव ने माओ को एक राष्ट्रवादी, साहसी और विचलनवादी (साम्यवादी सिद्धांत से विचलित होने वाला) व्यक्ति बताया था. वहीं पेंग ने ख़्रुश्चेव को पुरुषवादी, स्वेच्छाचारी और निरंकुश कहा था. पेंग ने ख्रुश्चेव पर मार्क्सवाद और लेनिनवाद को धोखा देने का आरोप लगाया था. इसके जवाब में ख्रुश्चेव ने चीन से सोवियत संघ के 1400 एक्सपर्ट और टेक्निशियन वापस बुला लिए थे. ख़्रुश्चेव ने चीन में सोवियत संघ के 200 से ज़्यादा प्रोजेक्ट रद्द कर दिए थे.”
बर्टिल लिंटनर ने लिखा है, ”चीन और भारत की जंग की शुरुआत में सोवियत संघ का रुख़ सतर्क था. हालांकि ख्रुश्चेव की सहानुभूति भारत के साथ थी लेकिन सोवियत संघ चीन की नाराज़गी भी मोल नहीं लेना चाहता था. दूसरी तरफ़ भारत के तत्कालीन रक्षा मंत्री वेंगालिल कृष्ण मेनन सोवियत संघ की तरफ़ झुकाव रखने वाले माने जाते थे लेकिन उन्हें 1962 की जंग की तैयारी नहीं करने के मामले में इस्तीफ़ा देना पड़ा था.”
मेनन ने 1962 में भारत-चीन युद्ध के बीच में ही इस्तीफ़ा दिया था. नेहरू ने अपने पास अस्थायी रूप से रक्षा मंत्रालय रखा था. सोवियत संघ भारत को युद्ध से पहले हथियार देता रहा था लेकिन युद्ध के दौरान दुविधा में था.
भारत-चीन संबंधों के विशेषज्ञ और पत्रकार मोहन राम ने लिखा था, “सोवियत संघ ने चीन से सैन्य कार्रवाई रोकने का अनुरोध किया था और मध्यस्थता की पेशकश की थी. भारत इसके लिए तैयार भी था. सोवियत संघ ने पूरी कोशिश की थी कि संकट की घड़ी में भारत को अमेरिका और ब्रिटेन के पाले में जाने से रोका जाए. भारत की सालों तक गुटनिरपेक्ष रहने की नीति औंधे मुँह गिरी और चीनी हमले के दौरान पूंजीवादी देशों से मदद लेनी पड़ी.”
मोहन राम ने अपनी किताब पॉलिटिक्स ऑफ चीन-इंडिया कन्फंट्रेशन में लिखा है कि भारत सरकार से कृष्ण मेनन के इस्तीफ़े को लेकर रूस चिंतित था.
मोहन राम ने लिखा है, ”सोवियत संघ को इस बात का अफ़सोस था कि चीनी हमले के कारण भारतीय नेताओं में से अपने एक विश्वसनीय दोस्त मेनन को खो दिया.”
मोहन राम ने लिखा है, ”निकिता ख़्रुश्वेच 1959 में भारत-चीन सरहद पर झड़प के दौरान भी तटस्थ थे और इसे लेकर चीन बहुत नाराज़ था. जब 1962 में युद्ध शुरू हुआ तो चीन ने सोवियत संघ के नेताओं से बात की. चीन ने कहा कि भारतीय बुर्जुआ साम्राज्यवाद के अनुयायी हैं, इसलिए सोवियत संघ के नेताओं को उसकी निंदा करनी चाहिए. सोवियत ने ऐसा करने से इनकार कर दिया. 12 दिसंबर को जब युद्ध ख़त्म हुआ तो ख़्रुश्चेव भारत के समर्थन में आए और कहा, ‘हम इस बात को ख़ारिज करते हैं कि भारत चीन के साथ युद्ध चाहता था.”
बर्टिल लिंटनर ने लिखा है कि चीन ने भारत को मजबूर कर दिया कि वह अमेरिका से मदद ले और दूसरी तरफ़ सोवियत संघ को भी चीन विरोधी कैंप में ला खड़ा किया. यह ऐसा मास्टरस्ट्रोक था, जिसने चीन को तीसरी दुनिया का नेता बना दिया.
डॉ राजन कुमार कहते हैं, ”जब सोवियत संघ और चीन के बीच प्रतिद्वंद्विता थी तब तो उसने भारत की मदद की नहीं. अब जब रूस चीन पर निर्भर है तब मदद की उम्मीद बेमानी है. कई ऐसे क्लासिफाइड दस्तावेज़ हैं, जिनसे पता चलता है कि नेहरू ने (1962 में) सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव से मदद मांगी थी लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था.”