राजीव डोगरा कहते हैं, ”फ़रवरी 2022 में यूक्रेन से जंग शुरू होने के बाद रूस पश्चिम को लेकर ज़्यादा आक्रामक हुआ है. ऐसे में रूस पश्चिम से दूसरे देशों के संबंधों को इस नज़रिए से भी देखता है.”
दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र के असोसिएट प्रोफ़ेसर डॉ राजन कुमार कहते हैं, ”लावरोव एक तरह से भारत को आगाह कर रहे हैं तो दूसरी तरफ़ रूस का डर भी है कि भारत की निर्भरता उस पर से ख़त्म ना हो जाए. सैन्य आपूर्ति के मामले में भारत की निर्भरता रूस पर कम हुई है. भारत सैन्य आपूर्ति के मामले में भी पश्चिम की ओर शिफ़्ट हो रहा है. आने वाले समय में यह ट्रेंड और बढ़ेगा.”
स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के मुताबिक़ 2009 से 2013 के बीच भारत का 76 प्रतिशत हथियार आयात रूस से होता था. 2019 से 2023 के बीच रूस से होने वाला हथियार आयात गिरकर 36 प्रतिशत पर आ गया.
यूक्रेन से जंग के दौरान रूस से भारत का व्यापार बढ़ा है लेकिन ये बढ़ोतरी भारत के ऊर्जा आयात के कारण है. पिछले साल दोनों देशों के बीच 66 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था लेकिन इसमें 40 प्रतिशत रूसी तेल था और 36 फ़ीसदी रूसी हथियार.
डॉ राजन कुमार कहते हैं, ”पश्चिम को लगता है कि चीन को काबू में करना है तो भारत अहम देश है. दूसरी तरफ़ भारत को लगता है कि सीमा पर चीन की आक्रामकता को जवाब देना है तो पश्चिम की मदद ज़रूरी है. ऐसे में रूस के विदेश मंत्री मानते हैं कि पश्चिम भारत और चीन में तनाव पैदा करने की कोशिश कर रहा है.”
डॉ कुमार कहते हैं, ”भारत रूस पर निर्भर नहीं रह सकता है. अगर चीन का सामना करना है तो रूस इसमें मददगार साबित नहीं होगा. 1962 की जंग में रूस ने भारत की मदद नहीं की थी. अब रूस ख़ुद ही चीन का जूनियर पार्टनर बनकर रह गया है. रूस की निर्भरता चीन पर ज़्यादा है. ऐसे में यह संभव नहीं है कि भारत रूस के कहे पर पश्चिम से संबंध सीमित कर ले.”
डॉ राजन कुमार कहते हैं, “रूस जब सोवियत संघ था, तब भी इंडो पैसिफिक को एशिया पैसिफिक ही कहता था जबकि अमेरिका इंडो-पैसिफिक कहता रहा है.”
1962 में जब चीन ने भारत पर हमला किया था तो सोवियत संघ भारत का बहुत क़रीबी था. तब चीन और सोवियत संघ में विकासशील देशों को नियंत्रित करने के लिए प्रतिद्वंद्विता थी.